एक कौवा प्यासा था

तेज धूप से कौवा प्यासा,
एक कौवा प्यासा था
पानी की थी कहीं न आशा।
एक घड़े में थोड़ा पानी ,
देख हुई उसको हैरानी।

कुछ सोचा फिर लाया कंकड़
लगा डालने एक एक कर।
ज्यों ज्यों कंकड़ पड़ता जाता ,
त्यों त्यों पानी चढ़ता जाता।

ऊपर तक पानी चढ़ आया ,
मेहनत का फल उसने आया।
पानी पीकर प्यास बुझाई ,
मेहनत का फल है सुखदायी।

pulkit khandelwal: